Friday, 19 January 2018

#बेटी_पढ़ाओ_बेटी_बचाओ #बेटियाँ



कहा किसने की बेटियाँ पराई होती है
अरे वो मूर्ख बता मुझे की बेटियाँ पराई कब होती है ।।
उसके जन्म के साथ घर में लक्ष्मी का वास होता हैं
उसके कोमल रुदन से घर गुंजइमान होता हैं ।।
उसके तुतलाती बोली पर भाई प्राण न्योछावर करता हैं
बहना कुछ बोले ना बोले भईया सब समझा करता हैं ।।
जब लगती है भूख प्यारी बिटियाँ को
माँ आती हैं दौड़कर सब काम छोड़कर
उसे देती है माँ अपने मातृत्व का सुख
और खुद में पाती है स्वर्ग का सुख ।।
माँ का बेटी से बेटी का माँ से
होता है गहरा नाता
अरे वो मूर्ख तुम्हें ये बात क्यों न समझ आता ।।
राखी में भाई के कलाई पर प्यार बांधती हैं
जुग जुग जियो भइया ऐसा वो प्यार बांधती हैं ।।
तुम कहते हो वो अपनी नहीं हैं
जा कर पुछो उस भाई से जिसकी बहन नहीं है ।।
राखी के दिन वो कितना रोता है
काश इक बहना होती ये सोचकर रोता हैं ।।
जिस माँ बाप ने कन्यादान नहीं किया
सच कहता हूँ उसने कुछ नही किया ।।
इतना प्यार, समर्पण , वात्सल्य कहाँ मिलेगा
अगर बेटियाँ नहीं होगी तो ये संसार नहीं चलेगा ।।
बेटियाँ ही इस भूधरा को स्वर्ग बनाती हैं
प्यार के अमृत से इसे बगीया को घर बनाती हैं ।।
तुमको आख़िर कैसे लगा कि ये पराई धन है
अरे ये तो माँ , बेटी , बहन हैं ।।
हाँ ये सच है कि वो बाबुल का घर छोड़ जाती है
बचपन के इस प्रेम बंधन को तोड़ जाती है ।।
ऐसा नहीं कि अब वो पराई हो गयीं
अब तो बिटिया दो दो घरों की दुलारी हो गई।।
कहना आप मेरा समझों
 बेटियाँ है अपनी पराई नहीं
कर देगी न्योछावर वो सबकुछ अपना
कभी तो समझो उसको अपना।।

©विवेक_कश्यप_किशलय

Tuesday, 9 January 2018

काश ! तुम समझ पाती ।।

#काश_की_तुम_समझ_पाती

काश ! मेरे अश्क़ भरे नयनों के
अल्फ़ाज़ को तुम समझ पाती ।
मेरे नयनों के अविरल
आब-के-चश्म को देख पाती ।
मैंने तेरे हर इक वादे को अपना किश्मत समझा
काश ! की तुम भी समझ पाती ।।
मेरा ग़ुनाह क्या था
मेरे इस आवारा दिल को समझा जाती ।।
मेरा फ़ितूर था कि मैं तेरे इज़हार-ए-मोहब्बत के लफ़्ज़ों में फ़ना हो गया
काश ! की तुम भी हो जाती।।
तेरे बेवफाई के बेरहम सलीके को मैं तो समझ गया
काश ! की मेरे प्यार के एहसास के गहराई को तुम समझ पाती ।।
मैंने देखा था सपना संग तेरे
तू मेरी हमसफ़र मैं हमसफ़र तेरा
मैंने समझा हक़ीकत सपना अपना
काश ! की तुम भी समझती इसको अपना ।।

© विवेक कश्यप किसलय

Friday, 5 January 2018

तूने बहुत रुलाया मुझे

तूने बहुत रुलाया बहुत
गलती क्या थी मेरी बता मुझे !
मैंने तो बस प्यार किया
तूने तो बस दर्द दिया !
सच्चे प्यार का यह अंजाम क्यों
प्यार के बदले दर्द का पैगाम क्यों  !
आंखे जल रही है रो रो कर
बहुत दर्द मिला तुझे खोकर !
पत्थर दिल में प्यार क्यों जगाया
वफ़ा की उम्मीदों को क्यों जगाया !
प्यार करना तूने ही सिखाया मुझे
आज यूँ तन्हा किसके सहारे छोड़ा मुझे !
अब तो जीना दुश्वार है बिन तेरे
तू ही बस तू ही प्यार है मेरी !
बहुत तरपाती है तन्हाई मेरी
आ जा ना वापस हरजाई मेरी !!

©विवेक कश्यप किसलय


Tuesday, 2 January 2018

सुर्ख़ ग़ुलाब

थीं पड़ी किताब के पन्नों में कहीं
वो ग़ुलाब निशानी प्यार की
देखकर यूं याद आया ग़ुलाब को
की कितने प्यार से दिया था आपको ।।
यौवन से पूर्ण लालिमा से परिपूर्ण
वो थी गुलाब लाल सी ।।
अब ढल गया यौवन
लालिमा लुप्त हुई
किताब के पन्नों के बीच
वो लाल गुलाब सुर्ख़ हुईं ।।